जनाब ’सरवर’ की गज़लें : ग़ज़ल 05
ग़ज़ल ०५ दिल को यूँ बहला रखा है दर्द का नाम दवा रखा है ! आओ प्यार की बातें कर लें इन बातों में क्या रखा है ! झिलमिल-झिलमिल करती आँखें जैसे एक दिया रखा है ! अक़्ल ने अपनी मजबूरी का थक कर नाम ख़ुदा रखा है ! मेरी सूरत देखते क्या हो ? सामने आईना रखा है !...
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आनन्द पाठक
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[12 Jan 2010 06:19 AM]



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