जनाब 'सरवर' की गज़लें : ग़ज़ल 06
ग़ज़ल ०६ मिरे जब भी क़रीब आई बहुत है ये दुनिया मैने ठुकराई बहुत है ! मै समझौता तो कर लूँ ज़िन्दगी से मगर ज़ालिम यह हरजाई बहुत है ! तुम्हें सरशारी-ए-मंज़िल मुबारक हमें ये आबला-पाई बहुत है ! कहाँ मैं और कहाँ मेरी तमन्ना मगर यह दिल ! कि सौदाई बहुत है बला से गर...
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आनन्द पाठक
ग़ज़ल
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[17 Jan 2010 02:44 AM]



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