मैं साँसे शाईराना चाहता हूँ ...

prosing सर्दी अपने शबाब पर है , मगर तरही कि सरगर्मी भी खूब जोर पर है ... ये दोनों ही अपने अपने जगह मुकम्मल हैं॥ इन दो कुदरती हसीन और जहीन चीजों के बीच ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ ... आप सबी के प्यार के लिए गूरू जी के आशीर्वाद के बाद ... ग़ज़ल का तीसरा शे'र गूरू जी ने... [पूरी पोस्ट]
writer "अर्श"
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[17 Jan 2010 04:17 AM]

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