एक ग़ज़ल : आंधियों से न कोई गिला कीजिए ...

हँसते रहो हँसाते रहो आँधियों से न कोई गिला कीजिएलौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिएसर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएगीगुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिएदर्द-ए-जानां भी है,रंज-ए-दौरां भी हैक्या ज़रूरी है ख़ुद फ़ैसला कीजिएमैं वफ़ा की दुहाई तो देता नहींआप जितनी भी चाहे जफ़ा कीजिएहमवतन आप हैं ,हमज़बां... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[17 Jan 2010 03:47 AM]

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