कौटिल्य दर्शन-अपनी गलत आदतों की उपेक्षा न करें

अमृत संदेश-पत्रिका प्रकृतिव्यवसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्। प्रकृत्तिवयवसनान्यूपेक्षते यो न चिरात्तं रिपवःपराभवन्ति।। हिंदी में भावार्थ-विभूति की इच्छा से उत्पन्न प्रमाद या अहंकार की प्रकृत्ति से उत्पन्न व्यसनों की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति के व्यसनों की... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

हिन्दीअभिव्यक्तिअनुभूतिअध्यात्म

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[17 Jan 2010 01:27 AM]

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