झूठ के पांव
झूठ के पांवझूठ के पांव निकलते देखा है सच पे सवार होते देखा है कान्हा की आड़ में, लीला का नाम ले, कदाचार देखा है पवनसुतों के सीने में,व्याभिचार देखा है मर्यादा पुरुशोत्तमों को करते, भ्रष्टाचार देखा हैअपनी आयु लीलने को, जानकी को लाचार देखा है दूर...
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रचना दीक्षित
सच
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[17 Jan 2010 01:24 AM]



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