ढँके जज्बात
दोस्तो, यह कविता मैने हिंद युग्म की दिसंबर माह की युनीकवि प्रतियोगिता के लिए भेजी थी जिसे १४वा स्थान मिला. अब इसे में आपकी राय के लिए प्रस्तुत करती हू..अब मै ढाँप लेती हूँअपने जज्बातो को तुमसे भीऔर ओढ़ लेती हूँएक स्वाँग भरी मुस्कान कोछुपा लेती हूँ सारा...
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अनामिका की सदाये......
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[17 Jan 2010 00:04 AM]



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