रिश्तों से क्या कहूँ ?
ज़र में भी अब अलफाज़ लड़खड़ाते हैं। खता अब सज़ा बन चुकी है। हर मोड़, एक-एक नाते, भूली बिसरी हर वो बातें,चाहत और फिर एक आहट सी। कि, अब उन्स के दीपक में भी लौ नहीं। कि, अब बाती से रौशनी कज़ा बन चुकी है। रिश्तों से क्या कहूँ?अलफाज़ अब भी कोरे कागज़ पर हैं।...
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[27 May 2009 00:13 AM]



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