एक ज़ख्म - कुछ अपना सा

 रिश्तों से क्या कहूँ ? आज फ़िर किसी ने, मेरे ज़ख्म कुरेदे हैं।कुछ अश्क मेरी पलकों पर,कुछ देर ठहर कर...तेरे इंतज़ार में सूखे हैं।याद करता नहीं मैं तुझे,पर अब तलक तेरे वादे निभाता है कोई। जिन राहों से तुम रुखसत हुए थे,उन पर, हर रोज़... हर दिन गुजारता है कोई।रेत के थे रिश्ते,... [पूरी पोस्ट]
writer Sifar
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[05 Aug 2009 14:34 PM]

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