हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते
हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते नज़दीक बहुत तुम रहे, बन जाओ न आदतये सोच के, मिलने तुझे अक्सर नहीं आते जिस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजराउस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल होअब...
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श्रद्धा जैन
Shrddha Jain
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[16 Jan 2010 22:50 PM]



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