रंग डालूँ एक लैंडस्केप
कलेजे में धुआँ-धुआँ सर्दियों का अलावपलकों में चौथ का चाँद होजी में हो कोहरे से नहायी काची- काची धूपहवा में, उड़ती-बिखरती मार्च की मदमाती महीन गंध ..गले में हों सोहनी के उनींदे सुरतबीयत ज़रा-ज़रा गिलहरी सीमन में जलते-बुझते मोरपंख रहेंहोंठों पर व्याकुल हो...
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पारूल
मेरे फ़ितूर
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[16 Jan 2010 06:03 AM]



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