अंधेरा
दिन भरईंट-गारे के बोझ तलेदबी चिंताएँअचानक मुखर हो उठती हैंअंधेरे में...अंधेरे में ही बचाती है माँअपने हिस्से की रोटीसुबह के नाश्ते के लिए...अंधेरी में ही माँगते हैं लाचार पितामाँ की चूड़ियाँबेटे की फीस के लिए...अंधेरे में हीदुआ माँगती है बहनभाई की नौकरी...
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Neeraj Shrivastava / Hyderabad, Bhopal, India
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[16 Jan 2010 02:47 AM]



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