मुक़र्रर समाज

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति सूरज धीमे धीमे बुझता सा लगने लगा । शायद हौले हौले पीला पड़ने लगा था, ठीक किसी गरीब के चेहरे की तरह । विद्यालय की घंटी, नहीं शायद घंटा, हर रोज़ की तरह जाकर महँगू ने बजा दिया था । महँगू जो पाँचवी कक्षा में पढता था, उसे यह कार्यभार मास्टर जी ने शुरू से सौंप... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

Short Story

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[15 Jan 2010 10:50 AM]

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