ग़ज़ल
शायद कोई, दोस्त मिल जाये कहीं ,रकीबों से भी, हाथ मिलाने लगा हूँ !गुलों की चाल से , वाकिफ हूँ अब ,गुलदानों में , कांटे सजाने लगा हूँ !हर सवाल पे ,खामोश मुस्कुराता हूँ ! ढंग दुनियां का , आजमाने लगा हूँ !दिल के धोखे , मैं अब नहीं खाता ,हर एक चोट पे ,...
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sanjeev kuralia
ग़ज़ल
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[15 Jan 2010 08:07 AM]



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