अवधी उपन्यास- क़ासिद (13)
शुक्लाजी अपने लरिका पर अपनी अम्मा क पानी छिड़कत देखेन त पानी केरि बूंदन त जइसे उन क्यार अतीत टपकन लाग। वा सामौ अइसिहि रहै। शुक्लाजी केरि छत पर तेरे तमाम टोली आवति दिखाई दे रही रहैं। जेत्ते लोग इ टोलिन म सामिल रहैं सब कि जबान पर याकै बात- जय श्री राम, जय...
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पंकज शुक्ल
अवधी उपन्यास
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[15 Jan 2010 03:13 AM]



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