फरिश्तों का सम्मेलन -हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi satire poem

अमृत संदेश-पत्रिका अब संभव नहीं है कोई कर सके सागर का मंथन या डाले हवाओं पर बंधन। इसलिये नये फरिश्ते इस दुनियां के रोकना चाहते हैं जहरीली गैसों का उत्सर्जन जिसे छोड़ते जा रहे हैं खुद समंदर से अधिक खारे विष से अधिक विषैले नीम से अधिक कसैले अपनी उन फरिश्तों ने महफिल सजाने के... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[25 Dec 2009 06:20 AM]

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