सौदागरों के बुत-व्यंग्य शायरी

 दीपक भारतदीप की हिंदी सरिता अख़बारों में छपे बड़े बड़े शख्सों के बयान अब आखों से आगे बढ़कर दिल की गहराई में नहीं जाते. ढेर सारा कागज़ का भंडार है चारों तरफ उसे खाने के लिए अक्षर पक्षी चाहिए स्याही की बह रही हैं धारा, मिलना जरूरी है उसको भी किनारा, बाज़ार के सौदागर केवल शय ही नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[15 Oct 2009 10:13 AM]

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