फरिश्ते होने का अहसास जताते-व्यंग्य कविता

 दीपक भारतदीप की हिंदी सरिता किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी हंसना कभी उसमें बहना कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते। ओ किताब हाथ में थमाकर लोगों को बहलाने वालों! शब्द दुनियां को सजाते हैं पर खुद कुछ नहीं बनाते कभी खुशी और... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

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[11 Nov 2009 09:53 AM]

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