“ओह…आज तो भयंकर कुहरा है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

शब्दों का दंगल ये हैं जी! खटीमा में आज सुबह 8 बजे के दृश्य आठ बजे है बहुत अंधेरा, देखो हुआ सवेरा! सूरज छुट्टी मना रहा है, कुहरा कुल्फी जमा रहा है, गरमी ने मुँह फेरा!देखो हुआ सवेरा! भूरा-भूरा नील गगन है, गीला धरती का आँगन है, कम्बल बना बसेरा! देखो हुआ सवेरा! मूँगफली के... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

बालगीत

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[14 Jan 2010 23:12 PM]

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