चाणक्य की नीति-पुरानी बातों को याद करने से लाभ नहीं

शब्दयोग सारथी-पत्रिका अहो बत विचित्राणि चरितानि महाऽऽत्मनाम्।लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।हिंदी में भावार्थ-अहे! महात्माओं का चरित्र भी बहुत विचित्र होता है। एक तरफ वह धन को तिनके समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते हैं।गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

आध्यात्म

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[14 Jan 2010 18:55 PM]

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