हमारी सारी दुनिया हो गयी झूठी

ख्वाब का दर बड़े भाई, यादवेन्द्र जी द्वारा अनूदित कविताएं अब तक हम इस ब्लाग पर प्रस्तुत करते रहे हैं। इस बार पेश है उनकी लिखी एक कविता, जिसके संदर्भ के लिए यहां पेश है खत में व्यक्त विचार.२८ जनवरी १९८९ को लिखी अपनी एक पुरानी कविता आज जाने क्यों अचानक याद आ... [पूरी पोस्ट]
writer Pankaj Parashar
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[14 Jan 2010 08:34 AM]

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