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किस्सा-कहानी वो आदमी नहीं मुकम्मल बयान है, माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है. वे कर रहे थे इश्क पे संजीदा गुफ़्तगु, मैं क्या बताऊँ, मेरा कहीं और ध्यान है. सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर, झोले में उसके पास कोई संविधान है. उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप, वो... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना अवस्थी दुबे

दुष्यंत कुमार की गज़ल

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[14 Jan 2010 08:13 AM]

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