अपने अश्क जी याद हैं आपको

विनय पत्रिका लोग कितने भुलक्कड़ हैउपेन्द्र नाथ अश्क जी को आप भूल गए। हाँ वही अश्क जी जो लगातार लिखते रहे। हिंदी उर्दू के बीच पुल बने रहे। वही जो इलाहाबाद की धुरी थे। गौरांग से, तिरछी टोपी लगाए। एकदम अपने घरेलू बुजुर्गों की तरह अपने से दिखते थे। 2010 में उनकी जन्म शती... [पूरी पोस्ट]
writer बोधिसत्व

जन्म-शती पर याद

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[14 Jan 2010 03:06 AM]

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