कुफ्र की बातें
बर्फ की कुछ फ़ाहें जब बहुत धीरे, नीचे आती हैं, किसी एक फाह को उडती हवा से तुम सोचकर, हाथ फैला देता हूँ तुम उडती, मुझसे दूर जाती हो...मैं भागता झुकता हाथ के बल तुम्हें पा लेता हूँ . तुम पिघल रही हो, निराकार सी होके.मुख से भाप निकलती है...क़ाश तुम यहाँ...
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[14 Jan 2010 02:19 AM]



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