मन को पतंग बना लो

joglikhisanjaypatelki उड़ती है वह बेख़बरजैसा उड़ाने वाला चाहेकितना समर्पण है उसमेंन कोई चाहनान कोई शर्तहवा के रूख़ को हमसफ़र बना करउड़ती रहती है वह अनंत आकाश मेंहम मन को भी पतंग बना लें तो कितना अच्छा होअनंत में उड़ते रहेंबिना किये परवाहकौन उड़ा रहा हैकौन काट डालेगाक्या होगा मेरा... [पूरी पोस्ट]
writer sanjay patel

हिन्दी.

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[14 Jan 2010 02:33 AM]

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