मन को पतंग बना लो
उड़ती है वह बेख़बरजैसा उड़ाने वाला चाहेकितना समर्पण है उसमेंन कोई चाहनान कोई शर्तहवा के रूख़ को हमसफ़र बना करउड़ती रहती है वह अनंत आकाश मेंहम मन को भी पतंग बना लें तो कितना अच्छा होअनंत में उड़ते रहेंबिना किये परवाहकौन उड़ा रहा हैकौन काट डालेगाक्या होगा मेरा...
[पूरी पोस्ट]
sanjay patel
हिन्दी.
21
1
0
1
0
[14 Jan 2010 02:33 AM]



Shuffle








