न पनघट न झूले न पीपल के साए, हरे खेत जख्मों के फ़िर लहलहाये । तरही में आज सुनिये दो शायरों दिगम्बर नासवा और रविकांत पांडेय की ग़ज़लें ।
मकर संक्रांति, पोंगल और लोहड़ी की शुभकामनाऍं तरही में इस बार काफी रचनाएं मिली हैं और सबसे अच्छी बात ये है कि इस बार सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक हैं । प्रतियोगिता जैसी तो कोई बात नहीं है लेकिन ये तो तय है कि प्रतिस्पर्धा हमेशा ही गुणवत्ता को जन्म देती...
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पंकज सुबीर
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[13 Jan 2010 22:04 PM]



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