आँगन हो गया पराया
जकड़े हुए हमें अपनी कुंडलियों में यादों के विषधररजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया परायाजीवन की सीमाओं पर अपौधे उगे नागफ़नियों केसिंचित किये दूध से हमनेउपजे होकर फ़ेनिल सपनेलहरें उमड़ी निगल गईं हैंनावें सब कोमल भावों कीऔर तीर हैं फ़न फ़ैलायेतत्पौर हुए साध को...
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राकेश खंडेलवाल
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[13 Jan 2010 21:23 PM]



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