जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...

और जाओ... जला कर राख कर दो वैशाली को इस आग में.... प्रतिभा कटियारअभी-अभी कैलेंडर बदला है. अभी-अभी हमने पिछले बरस के अचीवमेंट्स का बहीखाता बंद किया है. अभी तक हमारे चेहरों पर सक्सेस की मुस्कुराहटें कायम हैं. जश्न दर जश्न...टीआरपी दर टीआरपी...सर्कुलेशन दर सर्कुलेशन... बेहद झूठी, खोखली सफलताओं के शोर में... [पूरी पोस्ट]
writer sushant jha
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[13 Jan 2010 14:42 PM]

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