नये दौर की मुहोब्बत...
अब शिकायतो का दौर खतम हो गयातेरी महफिल से उठा और बेगाना हो गयातूने पलट के भी ना देखा अपने तलबगार कोऐसा छिटका दामन से कि दिल से भी जुदा हो गयाहश्र ऐसा होगा मुहोब्बत का तेरी महफिल मेंदर्द वालो के ही घर में दर्द अजनबी हो गयाक्या फरक रह गया तुझमे और बे- वफाओ...
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अनामिका की सदाये......
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[13 Jan 2010 13:59 PM]



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