नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'
नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'हवा में ठंडक बहुत हैकाँपता है गात साराठिठुरता सूरज बिचाराओस-पालानाचते हैं-हौसलों को आँकते हैंयुवा में खुंदक बहुत हैगर्मजोशी चुक न पाए,पग उठा जो रुक न पाएशेष चिंगारीअभी भी-ज्वलित अग्यारी अभी भीदुआ दुःख-भंजक बहुत हैहवा...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
contemporary hindi poetry
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[13 Jan 2010 12:25 PM]



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