आफ़ताबी आगोश...
रात की खुमारी को....जब सुबह.. आफ़ताब ने आगोश में भर लिया....नम के होठों के फूल...गर्म सीने पे हमने खिला दिये....आफ़ताबी आगोश... मुझे कसता रहा...मैं बर्फ़ानी नदी सी पिघलती रही....पैरों तले.. ज़मी बहने लगी...ज़िस्म धूप सा जलता रहा...ख्वाब का कंबल ओढे... दो...
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love is in the air..कुछ कहा है तुम्हारे लिये..
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[13 Jan 2010 11:43 AM]



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