सफ़ेद-सफ़ेद ओस

सलाम करता चलूं सफ़ेद-सफ़ेद ओस उतर आती है.शाम होते ही रोआं सिहरने लगता है.चाय की तलब दिन भर लगी रहती है.जैकेट को लिहाफ़ बनाने की नाकाम कोशिशेंचलती है दिन भर.उठो तो बैठने का जी नहींबैठो तो उठने का मन नहीं करता.किसी कब्र में लेटने को जी करता है.इन कोहरों कोकोई टोपी... [पूरी पोस्ट]
writer ritu raj
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[13 Jan 2010 12:52 PM]

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