कोई शाख़े-सब्ज़ हिला साईं- महमूद अकरम
शायर होना आसान है लेकिन वली होना बहुत मुशकिल है। गा़लिब का वली न हो सकने का दर्द और बहाना उसके इस शे’र से ज़ाहिर होता है-ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान “ग़ालिब”तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होतागा़लिब और कबीर में यही फ़र्क है । गा़लिब महफ़िलों में...
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सतपाल
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[13 Jan 2010 03:14 AM]



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