“ सहज..2010..”
नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..!2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है..? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे, नसों मे, बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ..?...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
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[13 Jan 2010 02:48 AM]



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