जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये

कुछ तो है... जो कि, बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी [...]... [पूरी पोस्ट]
writer डा. अमर कुमार

सँदर्भहीन

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[02 Jan 2010 10:59 AM]

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