किस्सा उस कम्बख्त औरत का

असुविधा सिलसिला शुरू तो खैर दया से ही हुआ थाउस उदास सी सुबह जब पहली बार झिझकते कदमो से आयी वह नम आंखे गड़ाये जमीन पर और सूनी उंगलियों में फंसी दुख सी नीली कलम खोलते-खोलते फूट ही पडी आखिरकार तो जैसे उसका दुख कोलतार सा पसर गया सबके भीतर कुछ पल के लिए ढीले हो गये... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय

किस्सा उस कम्बख्त औरत का

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[13 Jan 2010 00:08 AM]

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