पावनता गंगाजल की, अपने अस्तित्व को जूझ रही.
मकर संक्रांति की अग्रिम शुभकामना के साथ एक चिंतनीय प्रकरण आप सब के समक्ष रखना चाहता हूँ.साथ ही साथ इस प्रक्रिया में सभी से सहयोग की भी अपील करता हूँ..पावनता गंगाजल की, अपने अस्तित्व को जूझ रही, बूँदों से स्पर्शित होकर, पापी मन पवित्र कहलाता,तरो ताज़गी...
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विनोद कुमार पांडेय
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[12 Jan 2010 10:37 AM]



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