इससे तो अच्छा था कि नश्तर ही चुभा जाता कोई

दर्पण के टुकड़े ज़ब से वो हम से और उनसे हम मिलने लगेजिन्दगी के सारे मायने ही बदलने लगेडर ये है कि फिर नया कोई जख्म ना मिले हमेउम्मीद ये कि शायद किस्मत अबसे बदलने लगेडर डर के राहे इश्क मे रखना था हर कदम मगर इक बार देखा फिर तो कदम खुद ब खुद चलने लगे ना कोई चाहत ना थी... [पूरी पोस्ट]
writer Krishan lal "krishan"
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[12 Jan 2010 08:45 AM]

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