अ...वि....ना.....श........। व्यंग्य हरिभूमि में प्रकाशित
सांप करोड़ों केकालोनी में तड़के तड़क बीन की धुन सुनाई दी। होगा कोई सपेरा, सोचकर मैं अखबार पढ़ने में तल्लीन हो गया। अखबार ही तो सुबह का नाश्ता है। इसके बिना मुझे चाय भी फीकी लगती है। बीन का शोर बढ़ता ही जा रहा था। कालोनी में भीड़ भी बढ़ने लगी और शोर...
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पवन *चंदन*
सांप सपेरा बीन लहरा
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[12 Jan 2010 07:00 AM]



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