कोई कुण्डी-ताला खोल गया
क्या जाने क्या बोल गयालो ये भी पिछला साल गयामत रह जाना बातों -बातों मेंउड़ते हैं परिंदे वे ही तोगढ़ते हैं कसीदे नभ की शान में जोकोई कुण्डी-ताला खोल गयाक्या जाने क्या बोल गयाकुछ गुपचुप बातें हैं करतेपिछले सालों के पन्ने भीचमकते हैं सुनहरी अक्षर ही तो...
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शारदा अरोरा
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[12 Jan 2010 01:52 AM]



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