धोखा
एक साँस .....जाने किस आस पर दिन गुजरती है..निरीह सी आंखो सेअपने ही दिए जीवन को, पल -पल निहारती हैपुचकारती है, दुलारती हैअपने अंतिम लम्हे तकउसी को ...जीने का सहारा मानती हैसच है ...जीने की वजह कोई बनाने के लिएइस तरह ..एक धोखा होना जरुरी हैऔर दिल के किसी...
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रंजना [रंजू भाटिया]
कविता
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[12 Jan 2010 01:30 AM]



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