मुझे नज़र से डर लगता है।
Saving...प्यार तुम्हारा मुझ में रम कर,नित मुझको सुंदर करता है,मुझे नज़र से डर लगता है।आँखों में काजल बन बैठे, होंठों पर लाली बन साजन,तिल बन कभी कपोल सजाते,कभी दृष्टि बन पूरा तन मन,कभी मुझे प्रतिबिंबित करते,यूँ जैसे दर्पण करता है,मुझे स्वयं से डर लगता...
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कंचन सिंह चौहान
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[11 Jan 2010 22:00 PM]



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