मैं चटक गया हूं, बस ठसक ना लगे

मन उवाच..... उंगलियां ग्लेशियर में पड़ी हैं। लगता है रज़ाई में किसी ने बर्फ की सिलें रख दी हैं। रात करवटों और ख्यालों में कट जाती है। कभी सर्दी का शुक्रिया अदा करने का मन करता है। कभी बैरन सिहरन को ठंडे होठों से गाली देने का मन करता है। गीली रात बंद रोशनदान में... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[11 Jan 2010 11:09 AM]

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