विवेकानंद जयंती

चेतना के स्वर उजाले की ओर स्वामी जी की वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमे कहा गया सर्प अपने फन तभी फैलाता है,  जब उसे चोट लगती है।अग्नि तभी धधक कर जलती है जब वह बुझने को होती है।शेर की गर्जना तभी लोगो को कम्पित करती है,जब वह खुले रेगिस्तान में दहाड़ता है।बादलों से बरसात तभी... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर

विवेकानंद

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[11 Jan 2010 09:16 AM]

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