आप गिनाते क्यूँ हो
तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो आपके हम पे हैं उपकार...
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नीरज गोस्वामी
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[10 Jan 2010 23:35 PM]



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