"वक़्त की कोख में नहीं..."
"वक़्त की कोख में नहीं..."शाम ढले हीख़ामोशी के तहखानों मेंकुछ वादों के उड़ते से गुब्बारसमेट लेते हैं मेरे अस्तित्व कोऔर अनजानी ख्वाइशों की आंखेकतरा कतरा सिहरने लगती हैंऔर रात के आंचल की उदासीसूनेपन के कोहरे में सिमटअपनी घायल सांसो से उलझतीओस के सीलेपन से...
[पूरी पोस्ट]
seema gupta
44
4
0
4
19
[10 Jan 2010 21:22 PM]



Shuffle








