एकला चलो रे
नोबेल सम्मानित गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की छोटी सी सारगर्भित कविता है 'एकला चलो रे' जिसका मेरा हिंदी अनुवाद इस प्रकार है - जब वे तुम्हारी पुकार ना सुनें,
एकला चलो रे!
एकला चलो रे! एकला चलो रे! एकला चलो रे! जब कोई तुमसे कुछ ना कहे, अरे अभागे,
जब सब...
[पूरी पोस्ट]
देवसूफ़ी राम बंसल
रवीन्द्र नाथ ठाकुर
21
0
0
0
0
[09 Jan 2010 05:15 AM]



Shuffle








