उस सज्जन पुरुष को लंपट और औरतबाज मानने के लिए तैयार नहीं है चाहे कितनी भी "बिना बाप की औलादें" आकर उसे अपना नाज़ायज़ बाप घोषित करें।

व्यंग्यलोक // व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट //चाहे कोई हथेली पर अंगार रखकर कहे या पूरा का पूरा अग्नि में खड़ा होकर मुनादी करे कि एक वयोवृद्ध महामहीम आदमी ने राजभवन में अय्याषी कांड रचाकर राजभवन की मर्यादा की वाट लगा दी है, तब भी हम यह मानने के लिए तैयार नहीं है। क्या बात कर... [पूरी पोस्ट]
writer प्रमोद ताम्बट

व्यंग्य

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[10 Jan 2010 09:38 AM]

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