daadee kee yaad
मैं आज बात कर रहा हूँ ,मेरे बचपन के खिड़गाँव के घर की..आज जावेद अख्तर की तरकश की एक ग़ज़ल पढ़ कर घर की याद आ गयी .दर असल बात घर की नहीं , बात है मेरे बचपन की. बचपन के बहाने अपनी दादी की याद को ताज़ा करने की.यही कोई साठसाल पहले की बात है...........स्कूल...
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[07 Jan 2010 16:00 PM]



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