विकास का पैराडाइम ग्लोबल वॉर्मिंग

मन उवाच..... शाम की गीली सर्दी में चौक पर दम फूंक हो रही थी कि चित्तरकार हाथ में अंडों की थैली लटकाए खरामा खरामा चप्पल घिसते चले आए। देखते ही पान सने लाल दांत दिखाए और दोस्ती का वज़न मेरे कंधों पर डाल दिया। गले मिल लेने के बाद बोले कहां हो पत्तरकार नज़र नहीं आते।... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[10 Jan 2010 03:56 AM]

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